भारत सरकार की प्राथमिकता हर परिवार को किफायती और गुणवत्तापूर्ण कैंसर उपचार उपलब्ध कराना है। 17 अक्टूबर, 2026 को राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने पेटेंट प्राप्त दवाओं सहित 137 गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं पर व्यापार मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के 30% तक सीमित कर दिया। संशोधित मूल्य 9 नवंबर, 2026 से प्रभावी होंगे। 4 नवंबर, 2026 तक, 70 कंपनियों ने 120 दवाओं के लिए संशोधित एमआरपी की घोषणा की थी, जिसमें सबसे अधिक 96.45% की कमी और 3,357.49 करोड़ रुपये की अनुमानित बचत दर्ज की गई थी। एमआरपी में औसतन कमी 20% से 70% तक है।
कैंसर की दवाओं की कीमतों में औसतन 20% से 70% तक की कमी आई
भारत में कैंसर के इलाज को अधिक किफायती बनाने के लिए सरकार ने देश भर में खुदरा और अस्पताल फार्मेसियों सहित दवा आपूर्ति की कड़ी में अधिक मार्कअप पर सीमा लगा दी है।
कंपनियों ने एमआरपी में औसतन 20% से 70% तक की कमी दर्ज की है। सबसे अधिक कमी 96.45% दर्ज की गई (4 नवंबर, 2026 तक)।
इन एमआरपी में कमी के कारण, अनुमानित बचत 3,357.49 करोड़ रुपये है (4 नवंबर, 2026 तक)। यह अनुमान अप्रैल 2025 से मार्च 2026 तक बेची गई मात्रा पर लागू मूल और संशोधित कीमतों के बीच के अंतर को दर्शाता है।
यह सीमा कैंसर रोधी दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) और खरीद मूल्य के बीच अंतर को लेकर राज्य अधिकारियों, रोगियों और नागरिकों की ओर से उठाई गई चिंताओं के उत्तर में निर्धारित की गई है।
उपभोक्ता एनपीपीए वेबसाइट और आधिकारिक फार्मा सही दाम मोबाइल ऐप दोनों का उपयोग करके कीमतों की पुष्टि कर सकते हैं।
नई कीमतें मार्च 2026 के वितरक मूल्य के आधार पर निर्धारित की गई हैं।
व्यापार मार्जिन क्या है ?
व्यापार मार्जिन वह अंतर है जो निर्माता की ओर से स्टॉक रखने वाले / वितरक से ली जाने वाली कीमत और किसी दवा के लिए रोगी की ओर से भुगतान की जाने वाले अधिकतम मूल्य ( एमआरपी ) के बीच होता है , जिसमें वस्तु एवं सेवा कर ( जीएसटी ) शामिल नहीं होता है। जब यह व्यापार मार्जिन बहुत अधिक होता है , तो आपूर्ति श्रृंखला में भारी मुनाफा जुड़ जाता है। इससे रोगियों के लिए अंतिम लागत बहुत बढ़ जाती है , जिससे पहले से ही महंगी कैंसर की दवाएं निर्माता की ओर से बेची जाने वाली कीमत से कहीं अधिक महंगी हो जाती हैं।
इस आदेश के अनुसार , प्रत्येक दवा का नया अधिकतम खुदरा मूल्य मार्च 2026 के औसत वितरक मूल्य से निर्धारित किया गया है। उस मूल्य पर व्यापार मार्जिन 30% से अधिक नहीं हो सकता है , और उस पर जीएसटी जोड़ा जाएगा।
दवाओं की कीमतों को कैसे नियंत्रित किया जाता है
मरीजों के लिए जीवन रक्षक आवश्यक दवाओं को अधिक किफायती बनाने के लिए , सरकार औषधि ( मूल्य नियंत्रण ) आदेश ( डीपीसीओ ), 2013 के अंतर्गत दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करती है।
यह आवश्यक वस्तु अधिनियम के जनादेश के अंतर्गत है , जिसका उद्देश्य दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करना , मुनाफाखोरी को रोकना और यह सुनिश्चित करना है कि जरूरी उपचार किफायती बने रहें।
डीपीसीओ , 2013 के अनुसार दवाओं को दो समूहों में बांटा गया है :
अनुसूचित दवाएं : ये वे दवाएं हैं जो डीपीसीओ , 2013 की पहली अनुसूची में शामिल हैं , जो राष्ट्रीय आवश्यक दवाओं की सूची ( एनएलईएम ), 2022 है। सरकार इनमें से प्रत्येक के लिए अधिकतम मूल्य निर्धारित करती है। एनएलईएम 2022 में 388 दवाएं सूचीबद्ध हैं , जिनमें से 63 कैंसर रोधी दवाएं हैं ।
गैर - अनुसूचित दवाएं : ये वे दवाएं हैं जो डीपीसीओ , 2013 की पहली अनुसूची में शामिल नहीं हैं। अनुसूचित दवाओं के उलट , जिनकी अधिकतम कीमत तय होती है , इनका विनियमन मूल्य निगरानी के माध्यम से किया जाता है : डीपीसीओ , 2013 के अनुच्छेद 20 के अंतर्गत , एक निर्माता बारह महीने में एमआरपी को 10% से अधिक नहीं बढ़ा सकता है , और यदि बढ़ोतरी 10% से अधिक हो जाती है , तो अगले बारह महीने के लिए कीमत को वापस 10% के स्तर पर लाना होगा।
इन निर्धारित आवश्यक दवाओं के साथ - साथ अन्य दवाओं की उच्च कीमतों पर ध्यान देने के लिए , सरकार ने 2019 में 42 गैर - निर्धारित कैंसर - रोधी दवाओं को कवर करते हुए एक व्यापार मार्जिन युक्तिकरण ( टीएमआर ) हस्तक्षेप का प्रायोगिक परीक्षण किया , जिसने रोगियों के लिए लागत को सफलतापूर्वक कम किया।
इसी आधार पर , और खुदरा और अस्पताल की कीमतों के बीच अधिक मार्जिन और अंतर दर्शाने वाले बाजार आंकड़ों के आधार पर , सरकार ने डीपीसीओ , 2013 के अनुच्छेद 19 के तहत अपनी असाधारण जनहित शक्तियों का इस्तेमाल किया। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय के तहत गठित एक विशेषज्ञ समिति की सिफारिश पर , प्राधिकरण ने 17 अक्टूबर , 2026 के अपने आदेश के माध्यम से 137 गैर - अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं ( पेटेंट वाली दवाओं सहित ) को व्यापार मार्जिन युक्तिकरण के अंतर्गत लाया।
राष्ट्रीय आवश्यक दवाओं की सूची क्या है ?
राष्ट्रीय आवश्यक दवाओं की सूची ( एनएलईएम ) भारत के लिए जरूरी , उच्च प्राथमिकता वाली दवाओं की एक आधिकारिक सूची है। इसका नवीनतम संशोधित संस्करण , एनएलईएम 2022, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ . मनसुख मांडविया ने 13 सितंबर , 2022 को सरकार के " सबको दवाई , सस्ती दवाई " के दृष्टिकोण के तहत जारी किया गया था।
इतिहास : इसे पहली बार 1996 में बनाया गया था , फिर 2003, 2011, 2015 और 2022 में अपडेट किया गया।
किसने बनाई : स्टैंडिंग नेशनल कमेटी ऑन मेडिसिन्स ( एसएनसीएम ) नामक एक विशेषज्ञ पैनल ने डॉक्टरों , वैज्ञानिकों , उद्योग विशेषज्ञों से बात करने और डब्ल्यूएचओ मानकों की जांच करने के बाद इसे बनाया।
यह सूची क्यों जरूरी है
कम लागत : परिवारों के लिए चिकित्सा संबंधी खर्चों को कम करने में सहायक।
बेहतर स्वास्थ्य सेवा : दवाओं की सुरक्षा , प्रभावशीलता और उच्च गुणवत्ता सुनिश्चित करती है।
बेहतर योजना : सरकारी खरीद , अस्पताल बजट , स्वास्थ्य बीमा और मेडिकल छात्रों के प्रशिक्षण में मार्गदर्शन प्रदान करती है।
आदेश के पीछे कानूनी शक्ति : डीपीसीओ , 2013 का पैराग्राफ 19
सरकार के लिए विशेष शक्तियां : असाधारण परिस्थितियों में , सरकार मानक नियमों से परे जनहित में कार्रवाई कर सकती है।
मूल्य निर्धारण या बदलाव : सरकार को किसी भी दवा के लिए अधिकतम ( सीलिंग ) मूल्य या खुदरा मूल्य निर्धारित करने का अधिकार है , जब तक वह इसे आवश्यक समझती है।
पहले से तय कीमत में बदलाव : यदि कोई कीमत पहले से तय हो चुकी है , तो सरकार थोक मूल्य सूचकांक से जुड़े सामान्य वार्षिक संशोधन की प्रतीक्षा किए बिना , इसे सीधे बढ़ा या घटा सकती है।
नई व्यवस्था कैंसर की दवाओं पर व्यापार मार्जिन को कैसे सीमित करती है
व्यापार मार्जिन अधिकतम खुदरा मूल्य का 30% तक सीमित : व्यापार मार्जिन ( निर्माता की ओर से वितरक से ली गई राशि और रोगी द्वारा भुगतान की गई राशि के बीच का अंतर ) 30% से अधिक नहीं हो सकता।
सभी रूपों पर लागू : यह नियम नीचे सूचीबद्ध सभी कैंसर - रोधी दवाओं पर लागू होता है , चाहे उनकी खुराक या रूप कुछ भी हो ( गोलियां , इंजेक्शन आदि ) और चाहे वे अकेले बेची जाएं या साथ में।
मार्च 2026 की कीमतों के आधार पर : इस