काव्य-धरोहर
कविताएँ
मीरा के पद, कबीर और रहीम के दोहे, राजस्थान के लोकगीत — शाही पांडुलिपि की तरह खुलती हमारी काव्य-परंपरा।
लोकगीत · राजस्थानी
केसरिया बालम, पधारो म्हारे देस
राजस्थानी लोकगीत (पारंपरिक) · मांड गायकी · ढोला-मारू की परंपरा
केसरिया बालम आवो नी, पधारो म्हारे देस।केसरिया बालम आवो नी, पधारो म्हारे देस॥
आवण जावण कह गया, कर गया कौल अनेक।गिणता गिणता घिस गई, म्हारी आंगलियाँ री रेख॥
— राजस्थानी लोकगीत (पारंपरिक)
नीति (दोहे) · ब्रज
रहीम के दोहे
अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना · 16वीं–17वीं सदी
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय॥
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।पानी गए न ऊबरै, मोती मानुष चून॥
— अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना
नीति (दोहे) · हिन्दी
कबीर के दोहे
कबीरदास · 15वीं सदी
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।जो दिल खोजा आपना, मुझ-सा बुरा न कोय॥
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥
— कबीरदास
भक्ति · राजस्थानी
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई
मीराबाई · 16वीं सदी · मेड़ता, राजस्थान
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई॥
तात मात भ्रात बंधु, आपनो न कोई।छाँड़ि दई कुल की कानि, कहा करिहै कोई॥
— मीराबाई
भक्ति · राजस्थानी
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो
मीराबाई · 16वीं सदी · मेड़ता, राजस्थान
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो॥
जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।खरच न खूटै, चोर न लूटै, दिन-दिन बढ़त सवायो॥
— मीराबाई