मुख्य सामग्री पर जाएँ

कविताएँ › लोकगीत · राजस्थानी

लोकगीत · राजस्थानी

केसरिया बालम, पधारो म्हारे देस

राजस्थानी लोकगीत (पारंपरिक) · मांड गायकी · ढोला-मारू की परंपरा

केसरिया बालम आवो नी, पधारो म्हारे देस।केसरिया बालम आवो नी, पधारो म्हारे देस॥

आवण जावण कह गया, कर गया कौल अनेक।गिणता गिणता घिस गई, म्हारी आंगलियाँ री रेख॥

साजन साजन मैं करूँ, साजन जीव जड़ी।साजन फूल गुलाब रो, सूँघूँ घड़ी घड़ी॥

केसरिया बालम आवो नी, पधारो म्हारे देस॥

— राजस्थानी लोकगीत (पारंपरिक)

भावार्थविरह में डूबी नायिका अपने केसरिया (वीर, प्रिय) साजन को अपने देस (घर) बुला रही है। साजन लौटने के कितने ही वादे कर गया था; दिन गिनते-गिनते उसकी उँगलियों की रेखाएँ तक घिस गईं। साजन उसके प्राणों की जड़ी-बूटी है, गुलाब के फूल जैसा, जिसे वह पल-पल महसूस करना चाहती है।

"पधारो म्हारे देस" राजस्थान की मांड गायकी का सबसे प्रसिद्ध लोकगीत है, जो ढोला-मारू की प्रेम-कथा की परंपरा से जुड़ा है और आज राजस्थान के स्वागत का प्रतीक बन गया है।

और कविताएँ

नीति (दोहे) · ब्रज

रहीम के दोहे

अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना · 16वीं–17वीं सदी

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय॥

पूरी कविता पढ़ें ›

— अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना

और कविताएँ ›

नीति (दोहे) · हिन्दी

कबीर के दोहे

कबीरदास · 15वीं सदी

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।जो दिल खोजा आपना, मुझ-सा बुरा न कोय॥

पूरी कविता पढ़ें ›

— कबीरदास

और कविताएँ ›

भक्ति · राजस्थानी

मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई

मीराबाई · 16वीं सदी · मेड़ता, राजस्थान

मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई॥

पूरी कविता पढ़ें ›

— मीराबाई

और कविताएँ ›

भक्ति · राजस्थानी

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो

मीराबाई · 16वीं सदी · मेड़ता, राजस्थान

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो॥

पूरी कविता पढ़ें ›

— मीराबाई

और कविताएँ ›

राजस्थान री बात

हर दिन मरुधरा की एक कहावत, एक सबद, एक ज़िलो

आज री कहावत

“पाणी पीजे छाण कर, गुरु कीजे जाण कर”

पानी छानकर पियो और गुरु सोच-समझकर बनाओ।

आज रो सबद

मनवार

मेहमान को प्रेम से आग्रह करके खिलाना-पिलाना

आज रो ज़िलो

चित्तौड़गढ़

  • चित्तौड़गढ़ किला
  • विजय स्तंभ
  • मीरा बाई

मेळा-तेवार

इस महीने: पुष्कर मेला, बूंदी उत्सव

कुंभलगढ़ महोत्सव

राजसमंद · दिसंबर

राजस्थान दर्शन →