काव्य-धरोहर
कविताएँ
मीरा के पद, कबीर और रहीम के दोहे, राजस्थान के लोकगीत — शाही पांडुलिपि की तरह खुलती हमारी काव्य-परंपरा।
भक्ति · राजस्थानी
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई
मीराबाई · 16वीं सदी · मेड़ता, राजस्थान
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई॥
तात मात भ्रात बंधु, आपनो न कोई।छाँड़ि दई कुल की कानि, कहा करिहै कोई॥
— मीराबाई
भक्ति · राजस्थानी
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो
मीराबाई · 16वीं सदी · मेड़ता, राजस्थान
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो॥
जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।खरच न खूटै, चोर न लूटै, दिन-दिन बढ़त सवायो॥
— मीराबाई