काव्य-धरोहर
कविताएँ
मीरा के पद, कबीर और रहीम के दोहे, राजस्थान के लोकगीत — शाही पांडुलिपि की तरह खुलती हमारी काव्य-परंपरा।
लोकगीत · राजस्थानी
केसरिया बालम, पधारो म्हारे देस
राजस्थानी लोकगीत (पारंपरिक) · मांड गायकी · ढोला-मारू की परंपरा
केसरिया बालम आवो नी, पधारो म्हारे देस।केसरिया बालम आवो नी, पधारो म्हारे देस॥
आवण जावण कह गया, कर गया कौल अनेक।गिणता गिणता घिस गई, म्हारी आंगलियाँ री रेख॥
— राजस्थानी लोकगीत (पारंपरिक)