कोटा के युवा चित्रकार अंकित बनवाड़िया ने मांडणा कला को बचाने के लिए पारंपरिक सामग्री और जनजागरूकता पर जोर दिया। वह इस प्राचीन लोक कला को आधुनिक जीवनशैली में भी जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं।

उनके अनुसार, मांडणा केवल सजावट नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़ी गहरी परम्परा है। वह बताते हैं कि पारम्परिक रूप से गोबर और चूने जैसी प्राकृतिक चीज़ों का उपयोग किया जाता है, जिनमें एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं।

परम्परा और बदलाव

पहले लोग दिवाली और अन्य त्यौहारों पर कच्चे मकानों में स्वास्तिक, माताजी के पगले जैसे शुभ प्रतीक उकेरते थे। आज के तेज़‑रफ़्तार जीवन में लोग रेडी‑मेड रंगोलियों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिनमें केमिकल्स होते हैं और वे परम्परागत मांडणों जितनी आकर्षक नहीं लगतीं।

वह कहते हैं, “संस्कृति खत्म नहीं हुई, इसका ह्रास हो रहा है” और यह भी जोड़ते हैं, “आज का इंसान कम समय में तैयार होने वाली चीजों की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहा है।”

भविष्य के लिए सुझाव

  • पारम्परिक साधनों और प्राकृतिक सामग्रियों की जानकारी नई पीढ़ी तक पहुँचाई जाए।
  • समय‑समय पर सांस्कृतिक आयोजन हों जहाँ लोक कलाकारों को मंच मिले।
  • घर में हाथ से बने मांडणे बनाकर केमिकल‑युक्त रंगों का प्रयोग कम किया जाए।
  • आंगनों में चबूतरों के साथ मांडणे बनाकर सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखी जाए।

अंकित बनवाड़िया ने बताया कि उन्होंने ड्राइंग एंड पेंटिंग में एम.ए. और बी.एड. की डिग्री प्राप्त की है और पहली‑दूसरी कक्षा से ही मांडणों की कला में रुचि रखी है। वह मांडणा के साथ राजस्थानी दीवार चित्रकारी (वॉल पेंटिंग) भी करते हैं।

उन्होंने लोगों से अपील की है कि यदि इस लोक कला को जीवित रखना है तो प्राकृतिक सामग्री का उपयोग बढ़ाया जाए और हाथ से बने मांडणे ही इस परम्परा की असली पहचान हैं।