Poems › Wisdom (dohe) · ब्रज
नीति (दोहे) · ब्रज
रहीम के दोहे
अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना · 16वीं–17वीं सदी
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय॥
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।पानी गए न ऊबरै, मोती मानुष चून॥
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग॥
बड़े बड़ाई ना करैं, बड़ो न बोलैं बोल।रहिमन हीरा कब कहै, लाख टका मेरो मोल॥
रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तरवारि॥
— अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना
रहीम अकबर के नवरत्नों में थे। उनके नीति के दोहे आज भी कहावतों की तरह बोले जाते हैं।
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नीति (दोहे) · हिन्दी
कबीर के दोहे
कबीरदास · 15वीं सदी
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।जो दिल खोजा आपना, मुझ-सा बुरा न कोय॥
— कबीरदास
लोकगीत · राजस्थानी
केसरिया बालम, पधारो म्हारे देस
राजस्थानी लोकगीत (पारंपरिक) · मांड गायकी · ढोला-मारू की परंपरा
केसरिया बालम आवो नी, पधारो म्हारे देस।केसरिया बालम आवो नी, पधारो म्हारे देस॥
— राजस्थानी लोकगीत (पारंपरिक)
भक्ति · राजस्थानी
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई
मीराबाई · 16वीं सदी · मेड़ता, राजस्थान
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई॥
— मीराबाई
भक्ति · राजस्थानी
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो
मीराबाई · 16वीं सदी · मेड़ता, राजस्थान
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो॥
— मीराबाई