Poems › Folk song · राजस्थानी
लोकगीत · राजस्थानी
केसरिया बालम, पधारो म्हारे देस
राजस्थानी लोकगीत (पारंपरिक) · मांड गायकी · ढोला-मारू की परंपरा
केसरिया बालम आवो नी, पधारो म्हारे देस।केसरिया बालम आवो नी, पधारो म्हारे देस॥
आवण जावण कह गया, कर गया कौल अनेक।गिणता गिणता घिस गई, म्हारी आंगलियाँ री रेख॥
साजन साजन मैं करूँ, साजन जीव जड़ी।साजन फूल गुलाब रो, सूँघूँ घड़ी घड़ी॥
केसरिया बालम आवो नी, पधारो म्हारे देस॥
— राजस्थानी लोकगीत (पारंपरिक)
"पधारो म्हारे देस" राजस्थान की मांड गायकी का सबसे प्रसिद्ध लोकगीत है, जो ढोला-मारू की प्रेम-कथा की परंपरा से जुड़ा है और आज राजस्थान के स्वागत का प्रतीक बन गया है।
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अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना · 16वीं–17वीं सदी
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— अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना
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मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई॥
— मीराबाई
भक्ति · राजस्थानी
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो
मीराबाई · 16वीं सदी · मेड़ता, राजस्थान
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो॥
— मीराबाई